एक्स्ट्रा लगेज

तुम अपना वजूद छोड़ गए
बिस्तर की सिलवटों के बीच
और मेरे होंठों के किनारों पर
रातों पे छोड़ गए
कभी न उतरने वाले क़र्ज़
सुबहों को लाद दिया तुमने
अपनी बाहों की गर्माहट से
और उजालों में रह गयी
तुम्हारी चहकने की आवाज़
कमरे में छूट गयीं
कभी न बिसरने वाली यादें
और कितना कुछ!
वैसे क्या-क्या लेकर जातीं तुम
तुम्हारे लगेज का वेट
पहले से ही ज़्यादा था
और यहाँ जो छूट गया
उसका वज़न भी काफ़ी है
ऐसा क्यों नहीं करतीं
कि एक बार फिर आओ
ख़ाली हाथ
और इन सबको भी ले जाओ
फ्लाइट या ट्रेन में
और हाँ

तुम्हारा हेयर बेंड रखा है 
मेरे कबर्ड की ऊपर वाली ड्राअर में
बाद में भूल न जाऊँ
इसलिए अभी याद दिला दिया
उम्मीद है
ये फ्लैट छोड़ने से पहले आ जाओगी
और इस बार
कुछ भी छोड़कर मत जाना

15 अगस्त, रॉबिन हुड और राम

आज 15 अगस्त को मैं अपने ही गाँव के स्कूल में था, मैंने वहाँ बच्चों से ये नहीं पूछा कि आज के दिन झन्डा क्यूँ फहराते हैं? और न ही उनसे देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति का नाम पूछा। मैंने ऐसा इसलिए नहीं किया क्यूँकि बहुत सारे लोग इस तरह के सवाल बच्चों से पूछते हैं और सही जवाब न मिलने पर कहते हैं कि जिन बच्चों को स्वतंत्रता दिवस के मायने नहीं पता वो आगे चलकर हमारे देश का भविष्य कैसे बनेंगे? इसलिए मुझे लगता है कि उन बच्चों पर लानत लादने से पहले हमें अपनी बुज़ुर्ग पीढ़ी से पूछना चाहिए कि हमें इस आज़ादी का क्या मतलब निकालना चाहिए? क्योंकि अगर आप किसी लड़के या लड़की के साथ पार्क में बैठे हैं तो आपसे पहले आपके घर आपकी ख़बर पहुँच जायेगी फिर परिवार वाले आपकी ख़बर लेंगे। हमारे देश के ज़्यादातर हिस्सों में आपसे ऐसी “हरकत” करने पर कोई सफ़ाई नहीं माँगी जाती, बस सीधे धुलाई की जाती है। बुजुर्गों के मुताबिक़ एक लड़की और लड़के का सड़क पर हाथ में हाथ डाल कर घूमना-चूमना अश्लील है बजाए किसी को मारने-पीटने, मूत्र विसर्जन करने, तोड़-फोड़ करने और धूम्रपान करने के। वो ये भी चाहते हैं कि स्कूल में पढ़ाई के नाम पर सबकुछ पढ़ाया जाए लेकिन सेक्स एजुकेशन? “वो” ऐसी चीज़ है जो सब अपने आप कहीं न कहीं से पढ़ ही लेंगे। चिन्ता तब बढ़ जाती है जब ऐसे देश में जहाँ (खजुराहो) मंदिर की दीवारों पर “काम” को बेहिचक उकेरा गया है, जिस देश ने दुनिया को “कामसूत्र” दिया है वहाँ गर्भनिरोध और सेनेटरी आइटम्स के विज्ञापन आने पर कभी चैनल तो कभी विषय बदल दिया जाता है। ऐसे ही लोगों के मुताबिक़ समाजसेवी, समाज सुधारक या “नेतागिरी” जैसा कार्य आपका करियर ऑप्शन नहीं हो सकता। इसलिए किसी और के बेटे या बेटी की सरकारी अथवा कॉर्पोरेट नौकरी का ज़िक्र करते हुए रोज़ खाना खाते वक़्त आप पर निशाना साधकर कहा जाता है कि ये महात्मा गाँधी या भगत सिंह बनकर देश को सुधारना चाहते हैं। उन्हें ऐसा लगता है सरकारी नौकरी में जाकर आप दो पैसे कमाकर और चार पैसे दबाकर उनका नाम ज़्यादा रोशन कर सकते हैं। नौकरी का ज़िक्र आते ही आरक्षण का हवाला देकर सामान्य तबके का दर्द बयाँ करने वाले बुज़र्गों को, कभी किसी दलित का अपनी मजदूरी माँगने पर उसे क्रेशर में पीस दिए जाने का दर्द महसूस करते नहीं देखा। और न ही किसी दलित का हुक्का-पानी बंद करने पर भूख हड़ताल करते। बेशक हमारे बुज़ुर्गों ने दलितों का कुछ नहीं बिगाड़ा शायद दूसरे ग्रह के लोग होंगे जो पहले दलितों को पाँव की जूती बनाकर रखते थे और अब बदलते हालातों से कुंठित होकर उन्हें जूती से ठोक देते हैं। इसके बजाये अच्छा होता कि वे ही दलितों के लिए ऐसी स्थिति पैदा कर देते कि दलित स्वयं आरक्षण का विरोध करने लगते जैसा कि विज्ञापन में लोगों को गैस की सब्सिडी छोड़ते दिखाया गया है। आरक्षण नाम की ही एक फ़िल्म आयी थी जिसमें बच्चन साहब कहते हैं “इस देश में दो भारत बसते हैं”। मैं यहाँ किसी को इस सम्वाद के ज़रिये किसी को “डबल स्टैण्डर्ड” नहीं कह रहा। मैं कौन होता हूँ कहने वाला? मैं आपको दूसरे भारत यानि मेरे गाँव के बारे में बताता हूँ। मेरे गाँव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो ऊपर की गयी माथा-पच्ची से भी कहीं ज़्यादा बड़े सवाल मौजूद हैं। जैसे कि वहाँ किसानों को खेत के लिए समय पर पानी और बीमारों के लिए समय पर इलाज मिल जाए, बच्चों को सरकारी स्कूल में इतनी शिक्षा मिल जाए कि उन्हें सरकारी नौकरी मिल जाए क्योंकि खेती-बाड़ी में सिर्फ गुज़ारा ही हो पाता है। बेरोज़गारी से त्रस्त नौजवान सट्टे में क़िस्मत आज़मा रहा है कि कहीं अगर नम्बर लग गया तो किसान क्रेडिट कार्ड से उठायी रकम उसका पिता न सही, वो वापिस कर देगा। शराब की लत भी अब गाँवों को गाज़र घास की तरह घेरने लगी है। गाँव के ही कुछ लड़के मुझसे पूछने लगे कि भैया, शहर में काम नहीं है

तो मैंने उन्हें “तकनीकी खेती” और “स्वयं सेवी संस्था” का लेक्चर पेल दिया। वो लेक्चर उन्हें कैसा लगा ये तो नहीं पता लेकिन उनके जाते ही मेरे लिए वहाँ एक और बड़ा सवाल तब पैदा हो गया जब मैंने आँगनबाड़ी में जाने वाले बच्चों को साँची के दूध पाउडर वाला “पौष्टिक दूध” पीते देखा और वहीं उनके घर के लोगों को 15 से 20 रुपये लीटर शुद्ध दूध, दूधवालों को बेचते देखा। गाँव के हालात देखकर ग़ालिब का एक शे’र याद आता है-

कोई उम्मीद बर नहीं आती कोई सूरत नज़र नहीं आती
मौत का एक दिन मु’अय्यन है नींद क्यों रात भर नहीं आती।

          कुछ इस तरह की उलझनों और सवालों के साथ में गाँव से शहर लौट आया हूँ लेकिन अभी भी गाँव से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाया। ये शायद तभी मुमकिन हो पायेगा जब इस शहर से और बड़े शहर चला जाऊँगा। वो कहते हैं न कि नए माहौल में ढलने में थोड़ा समय लगता है। कुछ बुज़ुर्ग लोग इसे पढ़ने के बाद मुझे सहानुभूति भरे सन्देश भेजकर कहें कि 15 अगस्त और 26 जनवरी को ऐसे सवाल आते हैं और चले जाते हैं इसलिए मुझे ज़्यादा चिंतित नहीं होना चाहिए। फिर भी मुझे राजनीति और सोशल मीडिया के ज़रिये बदलते परिदृश्य को देखकर लगता है कि बहुत जल्द छोटे शहरों और गाँव के हालात बदलने कोई रॉबिन हुड या राम ज़रूर आएगा लेकिन कितनी जल्दी आएगा उसका मुझे अंदाज़ा नहीं है।