ग़लती

मैं…
मैं ग़लतियों का पुलिंदा हूँ
और ख़ुदकी की ग़लती
किसे दिखती है
अक्सर नहीं दिखती
पर जब कोई दिखाता है
तो मैं कोशिश करता हूँ देखने की
कभी-कभी नहीं देख पाता
और इसमें भी ग़लती
हो ही जाती है

टूटती हुई चीज़ें

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने
वो जब टूटते हैं
तो उससे ज़रा पहले
हल्की रोशनी देते हैं
और फिर बुझ जाते हैं सदा के लिए
किसी टूटते तारे की तरह…

इस दुनिया से भी बड़े-बड़े वादों को
टूटते देखा है मैंने…