यथार्थ

इश्क़ में यूँ भी कभी होता है जब इश्क़ इश्क़ जैसा नहीं लगता जब चाँद चाँद ही लगता है और महबूब महबूब नहीं लगता

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शे’र

तुम्हें क्या पता कि मुझे क्या-क्या नहीं लगता तुम्हें इश्क़ करना अब इश्क़ जैसा नहीं लगता ख़ुश बहुत हुए रक़ीब* की बातें करके मुझसे लगता है मैं तुम्हें अब पहले…

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बेचारी

ख़ुशियाँ आके फुसफुसाती है कानों में ज़िन्दा कैसे रहूँ मैं ज़िन्दगी के तूफानों में

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मतभेद

मोहब्बत के इतने किस्सों में हर किस्सा मेरा अधूरा रहा कभी वो मुझसे रूठ गयी कभी मैं उसे गवारा* न रहा *बर्दाश्त

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क्या कहती हो?

तुम पूछ रही थी न कि तुम्हारे घर में वाशिंग मशीन है फिर भी खिड़की के पर्दे कितने गंदे हैं तकिए का कवर भी कितना गंदा हो गया है तेल…

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एक्स्ट्रा लगेज

तुम अपना वजूद छोड़ गएबिस्तर की सिलवटों के बीचऔर मेरे होंठों के किनारों पररातों पे छोड़ गएकभी न उतरने वाले क़र्ज़सुबहों को लाद दिया तुमनेअपनी बाहों की गर्माहट सेऔर उजालों…

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हुस्ना

पहले प्यार करते हैंफिर दग़ा देते हैंदिल तोड़ देते हैंमाफ़ी भी माँगते हैंफिर प्यार करते हैंऔर अचानक छोड़ देते हैंये कौन लोग हैंकहाँ से आते हैं?

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दिलजले

ख़ुद को मना तो लिया है उसे दिल से हटाने कोपर अब भी उसकी तस्वीर हटाने का मन नहीं करता

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