ज़ाया होती रातें

क्लास वर्क भी बहुत रहता है,
और होमवर्क भी कुछ ज़्यादा ही मिलता है,
ज़िन्दगी के इक सबक पर आकर अटक सा गया हूँ,
मसरुफ़ियत इस कदर हो चली है,
कि तारीख़ भी ठीक-ठीक समझ नहीं आती हैं,
कभी अगली तारीख़ पे पहुँच जाता हूँ,
तो कभी पिछली से निकल ही नहीं पाता,
इन तारीख़ों में कई रातें बीत गयीं,
जब न कोई नज़्म ही लिखी,
न तुझे ही ठीक से याद कर पाया,
रातें यूँ ही ज़ाया हो रही हैं,
और कब तक होती रहेंगी,
कुछ कह नहीं सकता…

Leave a Reply

Close Menu